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कहानी आउवा ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत की जिन्होंने 1857 की क्रांति में एक अहम भूमिका निभाई – इतिहास की खिड़की

Thakur Kushal Singh Auwa History

जाने किस्सा क्या है?

  • ये मारवाड़ रियासत के पाली जिले के आऊवा के ठाकुर थे।
  • इन्होने 1857 ई. की क्रांति में भाग लिया था।
  • इनका संपर्क महान स्वतंत्रता सेनानी तांत्या टोपे से भी था।
  • जोधपुर लीजियन के विद्रोही सैनिको ने खेरबा स्थान पर ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत से भेंट की व उनसे उनका नेतृत्व करने को कहा।
  • आऊवा अंग्रेज़ी हुकूमत में एक रेल मार्ग हुआ करता था जो एरिनपुरा छावनी से पहले पड़ता था।
  • ठाकुर कुशाल सिंह ने अंग्रेज़ी व जोधपुर राज्य की सम्मिलित सेना को हराया था।
  • क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी अफसर मॉक मैंशन का सिर काटकर किले की पोल पर लटका दिया था।

ढोल बाजे चंग बाजे, भलो बाजे बाँकियो,

अंग्रेजी अफसर को मारकर, दरवाज़ा पर टाँकियो।

पढ़े पूरी कहानी..

8 सितम्बर,1857, बिठौड़ा का युद्ध
आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह, आलनियावास के ठाकुर अजीत सिंह, गुलर के ठाकुर बिशन सिंह आदि अपनी-अपनी सेना लेकर आऊवा आ गए। दूसरी ओर मारवाड़ के शासक तख़्त सिंह ने कैप्टेन हीथकोट, किलेदार अनार सिंह और फौजदार राजमल लोढ़ा के नेतृत्व में एक सेना क्रांतिकारियों के खिलाफ भेजी। क्रांतिकारियों के हाथो अनार सिंह मारा गया और इस युद्ध में ठाकुर कुशाल सिंह के नेतृत्व में आऊवा की सम्मिलित सेना ने विजय प्राप्त की।

18 सितम्बर, 1857, चेलावास का युद्ध
बिठौड़ा के युद्ध में मिली हार के पश्चात जॉर्ज लॉरेंस ने 18 सितम्बर, 1857 ई. को आऊवा के किले पर आक्रमण किया और विद्रोही सेना को खदेड़ दिया। किन्तु इसी युद्ध में विद्रोहियों द्वारा अंग्रेजी सेना को मुँह की खानी पड़ी और वह बुरी तरह पराजित हुई। इसी युद्ध में जोधपुर का पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेंसन मारा गया जिसे क्रांतिकारियों ने किले की पोल पर लटका दिया था। अंग्रेजी सेना और आऊवा के बिच हुए इस युद्ध को गोरे-काले का युद्ध भी कहते है।

इस युद्ध के पश्चात आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह ने दिल्ली की ओर कूच किया, पर मार्ग में ही अंग्रेजी पल्टन द्वारा पराजित हुए।

20 जनवरी, 1858, आऊवा का युद्ध
भारत के तत्कालीन गवर्नर लार्ड कैनिंग ने कर्नल होम्स के नेतृत्व में एक सेना आऊवा भेजी। इस समय तक विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुंच चुके थे तथा अंग्रेज़ो ने आसोप, गूलर तथा आलणियावास की जगीरो पर अधिकार कर लिया था। जब ठाकुर कुशाल सिंह को विजय की कोई उम्मीद नहीं रही तो उन्होंने आऊवा के किले का भार अपने छोटे भाई पृथ्वीसिंह को सौंप दिया और वह सलूम्बर चले गए। 15 दिनों बाद अंग्रेज़ो ने आऊवा पर अधिकार कर लिया।

8 अगस्त, 1860 को ठाकुर कुशाल सिंह ने नीमच में अंग्रेज़ो के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। 10 नवम्बर, 1860 को मेजर टेलर की अध्यक्षता वाले जाँच आयोग ने उन्हें निर्दोष माना और रिहा कर दिया। 1864 के करीब मारवाड़ के वीर क्रन्तिकारी ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत का देहांत हो गया।

मारवाड़ की वीरभूमि ने ऐसे कई वीर सपूतो को जन्म दिया जिन्होंने आगे चलकर भारतवर्ष में अपना नाम किया।

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Picture and Knowledge Source: Wikipedia/Google

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